हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.5.20

कांड 9 → सूक्त 5 → मंत्र 20 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
अ॒जो वा इ॒दम॑ग्ने॒ व्यक्रमत॒ तस्योर॑ इ॒यम॑भव॒द्द्यौः पृ॒ष्ठम् । अ॒न्तरि॑क्षं॒ मध्यं॒ दिशः॑ पा॒र्श्वे स॑मु॒द्रौ कु॒क्षी ॥ (२०)
अज ने सब से पहले व्यतिक्रमण किया तो उस का पेट भूमि, पीठ द्यौ, अंतरिक्ष मध्य भाग, पसलियां दिशाएं और कोखें सागर हुई. (२०)
Aj first of all, devised, then his stomach became the land, the back, the space was the middle part, the ribs were directions and the wombs were the ocean. (20)