हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
Home » Atharvaved » Kand 9 » Sukta 7 अथर्ववेद (कांड 9) यजमानब्राह्म॒णं वा ए॒तदति॑थिपतिः कुरुते॒ यदा॑हा॒र्याणि॒ प्रेक्ष॑त इ॒दं भूया३ इ॒दा३मिति॑ ॥ (१)
जो यजमान को अथवा ब्राह्मण को अतिथि पति अर्थात् अतिथि का पालन करने वाला बनता है, वह आहार्य अर्थात् यज्ञ संबंधी द्रव्य को देखता हुआ कहता है कि यह होना चाहिए. (१)
The one who becomes the host or the Brahmin who follows the guest husband i.e. the guest, he looks at the food i.e. the substance related to the yajna and says that it should be. (1)
अथर्ववेद (कांड 9) यदाह॒ भूय॒ उद्ध॒रेति॑ प्रा॒णमे॒व तेन॒ वर्षी॑यांसं कुरुते ॥ (२)
जो अतिथि से बारबार भोजन करने की बात कहता है, वह प्राण शक्ति की वृद्धि करता है. (२)
The one who asks the guest to eat again and again increases the vitality. (2)
अथर्ववेद (कांड 9) उप॑ हरति ह॒वींष्या सा॑दयति ॥ (३)
जो अतिथि के लिए भोजन लाता है, वह हवि प्राप्त करता है. (३)
The one who brings food for the guest receives the havi. (3)
अथर्ववेद (कांड 9) तेषा॒मास॑न्नाना॒मति॑थिरा॒त्मञ्जु॑होति ॥ (४)
अतिथि उन परोसे हुए भोज्य पदार्थो का आत्मा में ही हवन करता है. (४)
The guest performs havan in the soul of those served food items. (4)
अथर्ववेद (कांड 9) स्रु॒चा हस्ते॑न प्रा॒णे यूपे॑ स्रुक्का॒रेण॑ वषट्का॒रेण॑ ॥ (५)
अतिथि का हाथ खुवा, उस के प्राण स्तूप अर्थात् यज्ञीय पशु को बांधने का खंभा और खाते समय चटखारे लेना ही वषट् शब्द है. (५)
Khuva, the guest's hand, his prana stupa i.e. the pillar of tying the sacrificial animal and taking chutney while eating is the word. (5)
अथर्ववेद (कांड 9) ए॒ते वै प्रि॒याश्चाप्रि॑याश्च॒र्त्विजः॑ स्व॒र्गं लो॒कं ग॑मयन्ति॒ यदति॑थयः ॥ (६)
अतिथि ही वे प्रिय अथवा अप्रिय अतिथि हैं, जो यजमान को स्वर्गलोक में भेजते हैं. (६)
Guests are the beloved or unpleasant guests who send the host to heaven. (6)
अथर्ववेद (कांड 9) स य ए॒वं वि॒द्वान्न द्वि॒षन्न॑श्नीया॒न्न द्वि॑ष॒तोऽन्न॑मश्नीया॒न्न मी॑मांसि॒तस्य॒ न मी॑मां॒समा॑नस्य ॥ (७)
जिस के विषय में विचार कर चुका हो, अतिथि उस का अन्न खाए, जिस के विषय में विचार चल रहा हो, उस का अन्न न खाए. (७)
The guest should eat the food of the one about whom he has thought, do not eat the food of the one about whom he is thinking. (7)
अथर्ववेद (कांड 9) सर्वो॒ वा ए॒ष ज॒ग्धपा॑प्मा॒ यस्यान्न॑म॒श्नन्ति॑ ॥ (८)
अतिथि जिस का अन्न खाता है, उस के सभी पापों को भी खाता है. (८)
The guest also eats all the sins of the one whose food he eats. (8)