हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.105.1

मंडल 1 → सूक्त 105 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 105
च॒न्द्रमा॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि । न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्ति विद्युतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥ (१)
उदकमय मंडल में वर्तमान सुंदर किरणों वाला चंद्रमा आकाश में दोड़ता है. हे सुवर्णमयी चंद्रकिरणो! कुएं से ढकी होने के कारण मेरी इंद्रियां तुम्हारे अग्रभाग को नहीं प्राप्त करतीं. हे धरती और आकाश! हमारे इस स्तोत्र को जानो. (१)
The moon with the present beautiful rays in the udakamaya mandala swings into the sky. O golden moons! Being covered by a well, my senses do not receive your forearm. O earth and sky! Get to know this hymn of ours. (1)