हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.105.8

मंडल 1 → सूक्त 105 → श्लोक 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 105
सं मा॑ तपन्त्य॒भितः॑ स॒पत्नी॑रिव॒ पर्श॑वः । मूषो॒ न शि॒श्ना व्य॑दन्ति मा॒ध्यः॑ स्तो॒तारं॑ ते शतक्रतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥ (८)
हे इंद्र! कुएं की आसपास की दीवारें मुझे उसी प्रकार दुःखी कर रही हैं, जिस प्रकार दो सौतें बीच में स्थित अपने पति को कष्ट देती हैं. हे शतक्रतु! जिस तरह चूहा सूत को काटता है, उसी प्रकार दुःख मुझे खा रहे हैं. हे धरती और आकाश! मेरी यह बात जानो. (८)
O Indra! The surrounding walls of the well are grieving me in the same way that two saunters torment my husband in the middle. O century! Just as the rat bites the yarn, so the sorrows are eating me. O earth and sky! Know this thing of mine. (8)