ऋग्वेद (मंडल 1)
यदब्र॑वं प्रथ॒मं वां॑ वृणा॒नो॒३॒॑ऽयं सोमो॒ असु॑रैर्नो वि॒हव्यः॑ । तां स॒त्यां श्र॒द्धाम॒भ्या हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑ ॥ (६)
हे इंद्र और अग्नि! मैने यज्ञकर्म के प्रारंभ में ही जो कहा था कि तुम दोनों का वरण करके तुम्हें सोम से प्रसन्न करूंगा, मेरी वही सच्ची श्रद्धा विचारकर आओ और निचोड़े हुए सोम को पिओ. यह सोम ऋत्विजों द्वारा विशेष आहुति देने योग्य है. (६)
O Indra and Agni! What I said at the very beginning of the yajnakarma that I will make you happy with Som by selecting both of you, come to my true faith and drink the squeezed Som. It deserves a special offering by the Som Ritvijs. (6)