ऋग्वेद (मंडल 1)
आ वां॒ रथं॑ पुरुमा॒यं म॑नो॒जुवं॑ जी॒राश्वं॑ य॒ज्ञियं॑ जी॒वसे॑ हुवे । स॒हस्र॑केतुं व॒निनं॑ श॒तद्व॑सुं श्रुष्टी॒वानं॑ वरिवो॒धाम॒भि प्रयः॑ ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! मैं जीवन एवं अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हारे आश्चर्यपूर्ण. मन के समान शीघ्र चलने वाले, वेगशील अश्चों से युक्त, यज्ञों में बुलाने योग्य हजार ध्वजों वाले, उदकपूर्ण, सौ धनों सहित, शीघ्रगामी एवं धन देने वाले रथ का आह्वान करता हूं. (१)
O Ashwinikumaro! I wonder for your life and food gain. Like the mind, I call upon a chariot with a thousand flags to be called in the yagnas,fast-moving, with glory, with hundred riches, with quick and money-giving chariots. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ऊ॒र्ध्वा धी॒तिः प्रत्य॑स्य॒ प्रया॑म॒न्यधा॑यि॒ शस्म॒न्सम॑यन्त॒ आ दिशः॑ । स्वदा॑मि घ॒र्मं प्रति॑ यन्त्यू॒तय॒ आ वा॑मू॒र्जानी॒ रथ॑मश्विनारुहत् ॥ (२)
उस रथ के चलते ही अश्विनीकुमारों की स्तुति में हमारी बुद्धि ऊर्ध्वमुखी हो जाती है. हमारी स्तुतियां उनके पास पहुंचती हैं. हम हव्य को स्वादपूर्ण बनाते हैं. रक्षक आते हैं. हे अश्विनीकुमारो! ऊर्जानी नाम की सूर्यपुत्री तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (२)
It is because of that chariot that our intellect becomes upwards in the praise of the Ashwinikumaras. Our praises reach them. We make the havya tasting. The guards come. O Ashwinikumaro! The daughter-in-law named Urjani climbed on your chariot. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
सं यन्मि॒थः प॑स्पृधा॒नासो॒ अग्म॑त शु॒भे म॒खा अमि॑ता जा॒यवो॒ रणे॑ । यु॒वोरह॑ प्रव॒णे चे॑किते॒ रथो॒ यद॑श्विना॒ वह॑थः सू॒रिमा वर॑म् ॥ (३)
हे अश्चिनीकुमारो! यज्ञ करने वाले अगणित जयशील मनुष्य संग्राम में शोभन धनप्राप्ति के लिए स्पर्धा करते हुए जब मिलते हैं, तभी उत्तम धरती पर तुम्हारा रथ दिखाई देता है. तुम उसी रथ पर स्तोता के लिए धन लाते हो. (३)
O aschinikumaro! When the yajna-doers meet in the countless jaishil man's struggle to get wealth, your chariot appears on the best earth. You bring money for the hymn on the same chariot. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वं भु॒ज्युं भु॒रमा॑णं॒ विभि॑र्ग॒तं स्वयु॑क्तिभिर्नि॒वह॑न्ता पि॒तृभ्य॒ आ । या॒सि॒ष्टं व॒र्तिर्वृ॑षणा विजे॒न्यं१॒॑ दिवो॑दासाय॒ महि॑ चेति वा॒मवः॑ ॥ (४)
हे कामवर्षको! तुमने घोड़ों द्वारा लाए हुए एवं सागर में डूबे हुए भुज्यु को अपने स्वयं युक्त घोड़ों द्वारा लाकर उनके पिता के समीप, दूरस्थ घर में पहुंचा दिया था. तुमने दिवोदास की जो महती रक्षा की थी, उसे हम जानते हैं. (४)
O work years! You brought Bhujyu, brought by horses and drowned in the sea, by your own horses, to a remote house near his father. We know the great protection you gave to Divodas. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वोर॑श्विना॒ वपु॑षे युवा॒युजं॒ रथं॒ वाणी॑ येमतुरस्य॒ शर्ध्य॑म् । आ वां॑ पति॒त्वं स॒ख्याय॑ ज॒ग्मुषी॒ योषा॑वृणीत॒ जेन्या॑ यु॒वां पती॑ ॥ (५)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम्हारे प्रशंसनीय अश्च तुम्हारे जुड़े हुए रथ को दौड़ की सीमा, सूर्य तक सबसे पहले ले गए थे. जीती हुई कुमारी ने मित्रता के लिए आकर कहा था कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं और तुम्हें अपना पति बना लिया. (५)
O aschinikumaro! Your admirable ass were taken to your connected chariot first to the limit of the race, to the sun. The winning virgin came for friendship and said that I am your wife and made you your husband. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वं रे॒भं परि॑षूतेरुरुष्यथो हि॒मेन॑ घ॒र्मं परि॑तप्त॒मत्र॑ये । यु॒वं श॒योर॑व॒सं पि॑प्यथु॒र्गवि॒ प्र दी॒र्घेण॒ वन्द॑नस्ता॒र्यायु॑षा ॥ (६)
तुमने रथ को चारों ओर के उपद्रव से बचाया, अत्रि ऋषि को जलाने के लिए असुरों द्वारा लगाई हुई आग शीतल जल से बुझाई, शंयु की गाय को दुधारू बनाया एवं वंदन ऋषि को दीर्घ आयु दी. (६)
You saved the chariot from the disturbance around, extinguished the fire set by the asuras to burn the sage Atri with cold water, made the cow of The Shanyu a milch and gave a long life to the sage Vrandan. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वं वन्द॑नं॒ निरृ॑तं जर॒ण्यया॒ रथं॒ न द॑स्रा कर॒णा समि॑न्वथः । क्षेत्रा॒दा विप्रं॑ जनथो विप॒न्यया॒ प्र वा॒मत्र॑ विध॒ते दं॒सना॑ भुवत् ॥ (७)
हे कुशल अश्विनीकुमारो! जैसे शिल्पी पुराने रथ को नया कर देता है, उसी प्रकार तुमने बुढ़ापे से ग्रस्त वंदन ऋषि को दुबारा युवा बना दिया था. गर्भस्थ कामदेव की स्तुति से प्रसन्न होकर तुमने उस मेधावी को माता के उदर से बाहर निकाला. तुम्हारा वही रक्षाकर्म सेवा करने वाले यजमान को प्राप्त हो. (७)
O kushal Ashwinikumaro! Just as the shilpi renews the old chariot, so you made the old age-ridden vandan sage young again. Pleased with the praise of the pregnant Cupid, you brought that genius out of the mother's womb. May your defense be received by the serving host. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अग॑च्छतं॒ कृप॑माणं परा॒वति॑ पि॒तुः स्वस्य॒ त्यज॑सा॒ निबा॑धितम् । स्व॑र्वतीरि॒त ऊ॒तीर्यु॒वोरह॑ चि॒त्रा अ॒भीके॑ अभवन्न॒भिष्ट॑यः ॥ (८)
तुम दूर देश में अपने पिता द्वारा त्यक्त होकर दुःख उठाते एवं प्रार्थना करते हुए भुज्यु के पास गए. तुम्हारी शोभन गति एवं विचित्र रक्षा को सब लोग समीप पाना चाहते हैं. (८)
You went to Bhujyu in a distant land, being struck by your father, suffering and praying. Everyone wants to get your awesome speed and strange defense closer. (8)