ऋग्वेद (मंडल 1)
सु॒सं॒का॒शा मा॒तृमृ॑ष्टेव॒ योषा॒विस्त॒न्वं॑ कृणुषे दृ॒शे कम् । भ॒द्रा त्वमु॑षो वित॒रं व्यु॑च्छ॒ न तत्ते॑ अ॒न्या उ॒षसो॑ नशन्त ॥ (११)
जिस प्रकार माता द्वारा स्नान आदि से शुद्ध किए जाने पर कन्या का रूप दर्शनीय हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी सबको दिखाने के लिए अपना शरीर प्रकाशित करो. हे कल्याण करने वाली उषा! अंधकार मिटाओ. अन्य उषाएं तुम्हारे कार्य व्याप्त नहीं करेंगी. (११)
Just as the form of the girl becomes visible when purified by the mother from bathing etc., similarly you also publish your body to show everyone. O welfare-doer Usha! Remove darkness. Other ushaas will not permeate your work. (11)