ऋग्वेद (मंडल 1)
क॒न्ये॑व त॒न्वा॒३॒॑ शाश॑दाना॒ँ एषि॑ देवि दे॒वमिय॑क्षमाणम् । सं॒स्मय॑माना युव॒तिः पु॒रस्ता॑दा॒विर्वक्षां॑सि कृणुषे विभा॒ती ॥ (१०)
हे उषादेवी! तुम कन्या के समान अपने अंगों को स्पष्ट करती हुई दानशील एवं प्रकाशयुक्त सूर्य रूपी प्रिय के समीप आओ. तुम युवती के समान अत्यंत प्रकाशयुक्त होती हुई तथा हंसती हुई सूर्य के सामने अपने गोपनीय अंगों को वस्त्ररहित करो. (१०)
O Ushadevi! You come close to the sun-like beloved with a dainty and lightened sun, clarifying your limbs like a virgo. You dress your secret organs in front of the sun, being very light and laughing like a young woman. (10)