हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.133.6

मंडल 1 → सूक्त 133 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 133
अ॒वर्म॒ह इ॑न्द्र दादृ॒हि श्रु॒धी नः॑ शु॒शोच॒ हि द्यौः क्षा न भी॒षाँ अ॑द्रिवो घृ॒णान्न भी॒षाँ अ॑द्रिवः । शु॒ष्मिन्त॑मो॒ हि शु॒ष्मिभि॑र्व॒धैरु॒ग्रेभि॒रीय॑से । अपू॑रुषघ्नो अप्रतीत शूर॒ सत्व॑भिस्त्रिस॒प्तैः शू॑र॒ सत्व॑भिः ॥ (६)
हे इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनो और महान्‌ मेघ को अधोमुख करके उसका विदारण करो. हे मेघस्वामी इंद्र! जिस प्रकार वृष्टि के अभाव में अन्न न होने से धरती दुःखी होती है, उसी प्रकार आकाश भी शोक करता है. जैसे त्वष्टा के भय से धरती और आकाश दुःखी थे, उसी प्रकार अन्न के अभाव से होते हैं. हे इंद्र! तुम अधिक बलवान्‌ होने के कारण शत्रु विनाश में क्रूर उपाय अपनाते हो, पर अपने यजमानों का ध्वंस नहीं करते. हे वीर! तुम इक्कीस सेवकों से घिरे रहते हो, इसलिए शत्रु तुम पर आक्रमण नहीं करते. (६)
O Indra! Listen to Our praise and turn the great cloud down and disparage it. O Meghaswamy Indra! Just as the earth suffers due to lack of food in the absence of rain, so also the sky grieves. Just as the earth and the sky were grieved by the fear of the skin, so are the lack of food. O Indra! You take cruel measures in enemy destruction because you are more strong, but do not destroy your hosts. Oh, hero! You are surrounded by twenty-one servants, so the enemies do not attack you. (6)