ऋग्वेद (मंडल 1)
व॒नोति॒ हि सु॒न्वन्क्षयं॒ परी॑णसः सुन्वा॒नो हि ष्मा॒ यज॒त्यव॒ द्विषो॑ दे॒वाना॒मव॒ द्विषः॑ । सु॒न्वा॒न इत्सि॑षासति स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः । सु॒न्वा॒नायेन्द्रो॑ ददात्या॒भुवं॑ र॒यिं द॑दात्या॒भुव॑म् ॥ (७)
हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाला यजमान उत्तम घर पाता है. सोमयज्ञकर्ता चारों ओर घिरे हुए शत्रुओं को समाप्त करके देवों के विरोधियों को भी नष्ट करता है. वह अन्न का स्वामी बनता है. उस पर कोई शत्रु आक्रमण नहीं करता. वह असीमित संपत्ति प्राप्त करता है. जो व्यक्ति इंद्र के निमित्त सोमयज्ञ करता है, उसे इंद्र चारों ओर अवस्थित एवं अति समृद्ध धन देते हैं. (७)
O Indra! The somras squeezer hosts find the best house. The Somayagyakar also destroys the opponents of the gods by eliminating the enemies surrounded around. He becomes the master of food. No enemy attacks him. He acquires unlimited assets. To the person who performs somayagya for the sake of Indra, Indra gives him rich and rich rich wealth located around him. (7)