ऋग्वेद (मंडल 1)
तुभ्य॑मु॒षासः॒ शुच॑यः परा॒वति॑ भ॒द्रा वस्त्रा॑ तन्वते॒ दंसु॑ र॒श्मिषु॑ चि॒त्रा नव्ये॑षु र॒श्मिषु॑ । तुभ्यं॑ धे॒नुः स॑ब॒र्दुघा॒ विश्वा॒ वसू॑नि दोहते । अज॑नयो म॒रुतो॑ व॒क्षणा॑भ्यो दि॒व आ व॒क्षणा॑भ्यः ॥ (४)
हे वायु! उषाएं दूरवर्ती आकाश में अपनी किरणों से घरों को आच्छादित करती हुई पहले के समान कल्याणकारी वस्त्र का विस्तार करती हैं. उषाओं की किरणें नवीन हैं. तुम्हारे यज्ञ को संपन्न कराने के लिए ही गाएं अमृत बरसाती हुई अन्न देती हैं. तुमने दीप्त आकाश में मेघों को पूर्ण करके नदियों को प्रभावशील बनाया. (४)
O air! Usha extends the same welfare garment as before, covering the houses with their rays in the distant sky. The rays of the ushas are new. Sing to complete your yajna only give nectar rained food. You made the rivers effective by filling the clouds in the bright sky. (4)