ऋग्वेद (मंडल 1)
मि॒त्रं न यं शिम्या॒ गोषु॑ ग॒व्यवः॑ स्वा॒ध्यो॑ वि॒दथे॑ अ॒प्सु जीज॑नन् । अरे॑जेतां॒ रोद॑सी॒ पाज॑सा गि॒रा प्रति॑ प्रि॒यं य॑ज॒तं ज॒नुषा॒मवः॑ ॥ (१)
गायों के स्वामी होने के इच्छुक एवं शोभन ध्यान वाले यजमानों ने गायों की प्राप्ति के निमित्त एवं अपने मनुष्यों की रक्षा के लिए मित्र के सेमान जिस अग्नि को जल के भीतर यज्ञकर्म से उत्पन्न किया, धरती और आकाश जिस अग्नि के बल और शब्द से कांपते हैं, उसी प्रिय एवं यज्ञसाधन अग्नि की वे रक्षा करते हैं. (१)
The hosts, who are willing to be the masters of cows and have a good attention, protect the fire that the friend's semen produced from the yagnakarma inside the water for the sake of the realization of the cows and to protect their human beings, the fire with which the earth and the sky tremble, the same beloved and sacrificial fire. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यद्ध॒ त्यद्वां॑ पुरुमी॒ळ्हस्य॑ सो॒मिनः॒ प्र मि॒त्रासो॒ न द॑धि॒रे स्वा॒भुवः॑ । अध॒ क्रतुं॑ विदतं गा॒तुमर्च॑त उ॒त श्रु॑तं वृषणा प॒स्त्या॑वतः ॥ (२)
हे मित्र एवं वरुण! तुम विविध इच्छाएं पूर्ण करने वाले हो. तुम्हारे मित्र बने हुए ऋत्विजों ने अभिलाषा पूर्ण करने वाला एवं कर्म करने की प्रेरणा देने वाला सोमरस धारण किया है. इसलिए तुम दोनों अपने सेवक के घर जाओ और उसकी पुकार सुनो. (२)
Oh my friend and Varun! You are going to fulfill various desires. The ritwijas who have become your friends have worn the somras that fulfill the desire and inspire them to act. So you both go to your servant's house and listen to his call. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
आ वां॑ भूषन्क्षि॒तयो॒ जन्म॒ रोद॑स्योः प्र॒वाच्यं॑ वृषणा॒ दक्ष॑से म॒हे । यदी॑मृ॒ताय॒ भर॑थो॒ यदर्व॑ते॒ प्र होत्र॑या॒ शिम्या॑ वीथो अध्व॒रम् ॥ (३)
हे कामवर्षक मित्र और वरुण! यजमान समस्त शक्तियां पाने के उद्देश्य से धरती और आकाश में आपके स्तुति योग्य जन्म की प्रशंसा करते हैं. तुम अपने पूजक यजमान को अभीष्ट फल देते हो एवं स्तुतिवचन तथा हव्यदान आदि कर्मो को स्वीकार करते हो. (३)
O workman friend and Varun! Hosts praise your praiseworthy birth in the earth and sky in order to gain all the powers. You give the desired fruits to your godly host and accept the deeds of praise and greetings, etc. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र सा क्षि॒तिर॑सुर॒ या महि॑ प्रि॒य ऋता॑वानावृ॒तमा घो॑षथो बृ॒हत् । यु॒वं दि॒वो बृ॑ह॒तो दक्ष॑मा॒भुवं॒ गां न धु॒र्युप॑ युञ्जाथे अ॒पः ॥ (४)
हे बलशाली मित्र एवं वरुण! जो यज्ञस्थल की भूमि आपको बहुत अधिक प्यारी है, उसे भली प्रकार सुशोभित कर दिया गया है. हे सत्यवादियो! उस पर बैठकर हमारे विशाल यज्ञ की प्रशंसा करो. जिस प्रकार शारीरिक बल प्राप्त करने के लिए गाय के दूध का उपभोग किया जाता है, उसी प्रकार आप आकाश में स्थित देवों को प्रसन्न करने के लिए सर्वत्र होने वाले यज्ञों को स्वीकार करते हो. (४)
O strong friend and Varun! The land of the yajnasthala, which is very dear to you, has been well beautified. O truthful! Sit on it and praise our huge yajna. Just as cow's milk is consumed to gain physical strength, you accept the yagnas that take place everywhere to please the gods in the sky. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
म॒ही अत्र॑ महि॒ना वार॑मृण्वथोऽरे॒णव॒स्तुज॒ आ सद्म॑न्धे॒नवः॑ । स्वर॑न्ति॒ ता उ॑प॒रता॑ति॒ सूर्य॒मा नि॒म्रुच॑ उ॒षस॑स्तक्व॒वीरि॑व ॥ (५)
हे मित्र और वरुण! तुम अपने महत्त्व के कारण गायों को विशाल धरती के जिस उत्तम स्थान में ले जाते हो, वे चोर आदि के अपहरण से सुरक्षित गोशाला में लौट आती हैं एवं प्रचुर दूध देती हैं. जिस प्रकार चोरों द्वारा पकड़े गए लोग चिल्लाते हैं, उसी प्रकार वे गाएं सांझ- सवेरे आकाश स्थित सूर्य की ओर देखकर रंभाती हैं. (५)
Hey friend and Varun! Because of your importance, the best place in the vast earth where you take cows, they return to the safe goshala by kidnapping thieves, etc., and give plenty of milk. Just as those caught by thieves shout, so do they sing at the sun in the sky in the evening. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
आ वा॑मृ॒ताय॑ के॒शिनी॑रनूषत॒ मित्र॒ यत्र॒ वरु॑ण गा॒तुमर्च॑थः । अव॒ त्मना॑ सृ॒जतं॒ पिन्व॑तं॒ धियो॑ यु॒वं विप्र॑स्य॒ मन्म॑नामिरज्यथः ॥ (६)
हे मित्र और वरुण! तुम जिस यज्ञप्रदेश में जाना स्वीकार कर लेते हो, वहां केश वाली अग्निज्वालाएं तुम्हारे यज्ञ के निमित्त तुम्हारी पूजा करती हैं. तुम आकर नीचे की ओर वर्षा को प्रेरित करो एवं मेधावी यजमान की उत्तम स्तुतियां स्वीकार करो. (६)
Hey friend and Varun! In the yajnapradesh where you accept to go, the firemen with hair worship you for your yajna. Come and inspire the rain downwards and accept the best praises of the brilliant host. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यो वां॑ य॒ज्ञैः श॑शमा॒नो ह॒ दाश॑ति क॒विर्होता॒ यज॑ति मन्म॒साध॑नः । उपाह॒ तं गच्छ॑थो वी॒थो अ॑ध्व॒रमच्छा॒ गिरः॑ सुम॒तिं ग॑न्तमस्म॒यू ॥ (७)
जो मेधावी एवं भली-भांति यज्ञ संपन्न करने वाला यजमान उत्तम यज्ञ साधनों द्वारा तुम्हारे निमित्त सोमयाग आदि के उद्देश्य से स्तुति करता हुआ हव्य देता है, उसी शोभनमति यजमान के समीप जाओ एवं उसी के यज्ञ की अभिलाषा करो. तुम हम पर कृपा की कामना करते हुए हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो. (७)
The host who performs the meritorious and well-to-do yajna gives a greeting to you by means of the best sacrificial means praising you for the purpose of somayag, etc., go to the same Shobhanmati host and wish for his yajna. You wish us kindness while accepting our praises. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वां य॒ज्ञैः प्र॑थ॒मा गोभि॑रञ्जत॒ ऋता॑वाना॒ मन॑सो॒ न प्रयु॑क्तिषु । भर॑न्ति वां॒ मन्म॑ना सं॒यता॒ गिरोऽदृ॑प्यता॒ मन॑सा रे॒वदा॑शाथे ॥ (८)
हे यज्ञशाली मित्र एवं वरुण! जिस प्रकार किसी काम में सबसे पहले मन लगाया जाता है, उसी प्रकार यजमान यज्ञों में सबसे पहले तुम्हें घृतादि हव्यों से पूजित करते हैं. वे तुममें भली-भांति संलग्नचित्त से स्तुति करते हैं. तुम प्रसन्नचित्त से अन्नयुक्त यज्ञ में पधारो. (८)
O sacrificial friend and Varuna! Just as the mind is first engaged in a work, so in the same way, hosts worship you with the gharitadi havans first of all in the yajnas. They praise you well in a fit of attachment. You come to the yajna with happiness. (8)