हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.151.8

मंडल 1 → सूक्त 151 → श्लोक 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 151
यु॒वां य॒ज्ञैः प्र॑थ॒मा गोभि॑रञ्जत॒ ऋता॑वाना॒ मन॑सो॒ न प्रयु॑क्तिषु । भर॑न्ति वां॒ मन्म॑ना सं॒यता॒ गिरोऽदृ॑प्यता॒ मन॑सा रे॒वदा॑शाथे ॥ (८)
हे यज्ञशाली मित्र एवं वरुण! जिस प्रकार किसी काम में सबसे पहले मन लगाया जाता है, उसी प्रकार यजमान यज्ञों में सबसे पहले तुम्हें घृतादि हव्यों से पूजित करते हैं. वे तुममें भली-भांति संलग्नचित्त से स्तुति करते हैं. तुम प्रसन्नचित्त से अन्नयुक्त यज्ञ में पधारो. (८)
O sacrificial friend and Varuna! Just as the mind is first engaged in a work, so in the same way, hosts worship you with the gharitadi havans first of all in the yajnas. They praise you well in a fit of attachment. You come to the yajna with happiness. (8)