ऋग्वेद (मंडल 1)
रे॒वद्वयो॑ दधाथे रे॒वदा॑शाथे॒ नरा॑ मा॒याभि॑रि॒तऊ॑ति॒ माहि॑नम् । न वां॒ द्यावोऽह॑भि॒र्नोत सिन्ध॑वो॒ न दे॑व॒त्वं प॒णयो॒ नान॑शुर्म॒घम् ॥ (९)
हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों धनसहित अन्न धारण करते हो, इसलिए धनयुक्त अन्न प्रदान करो. वह विशाल धन तुम्हारी बुद्धि द्वारा रक्षित है. दिन एवं रात को तुम्हारे समान शक्ति प्राप्त नहीं है. नदियों और पणियों ने तुम्हारा देवत्व नहीं पाया. पणियों को तो तुम्हारे समान धन भी प्राप्त नहीं है. (९)
Oh my friend and Varun! You both hold food with wealth, so provide rich food. That vast wealth is protected by your intelligence. Day and night do not have the same power as you. Rivers and valleys have not found your divinity. The people don't even have the same wealth as you. (9)