हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.184.5

मंडल 1 → सूक्त 184 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 184
ए॒ष वां॒ स्तोमो॑ अश्विनावकारि॒ माने॑भिर्मघवाना सुवृ॒क्ति । या॒तं व॒र्तिस्तन॑याय॒ त्मने॑ चा॒गस्त्ये॑ नासत्या॒ मद॑न्ता ॥ (५)
हे धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारे सम्मान के लिए हव्य के साथ ही इस पाप विनाशकारी स्तोत्र की रचना की गई है. है सत्यस्वरूपो! मुझ अगस्त्य ऋषि से प्रसन्न होकर पुत्रलाभ एवं अपने हित के लिए यज्ञस्थल में आओ. (५)
O Lord of wealth Ashwinikumaro! For your honor, this sin-destructive hymn has been created along with the havya. It's true! Please me from the sage Agastya, come to the yagnasthala for the benefit of my son and for your own benefit. (5)