ऋग्वेद (मंडल 1)
यश्चि॒द्धि त॑ इ॒त्था भगः॑ शशमा॒नः पु॒रा नि॒दः । अ॒द्वे॒षो हस्त॑योर्द॒धे ॥ (४)
हे सूर्य! तुम अपने दोनों हाथों में उपभोग के योग्य धन को धारण करते हो. वह सबके द्वारा प्रशंसित है. उससे कोई द्वेष नहीं रखता. (४)
O sun! You hold the money you are eligible for consumption in both your hands. He is admired by everyone. There is no hatred for him. (4)