ऋग्वेद (मंडल 1)
कस्य॑ नू॒नं क॑त॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑ । को नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च ॥ (१)
मैं देवताओं में से किस श्रेणी के किस देवता का सुंदर नाम पुकारूं? कौन देवता मुझ मरने वाले को विशाल धरती पर रहने देगा? जिससे मैं अपने माता-पिता को देख सकूं? (१)
Which of the following categories of gods should I call the beautiful name of? Which god will let me die on the vast earth? So that I can see my parents? (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒ग्नेर्व॒यं प्र॑थ॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑ । स नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च ॥ (२)
मैं देवताओं में सबसे पहले अग्नि का नाम पुकारता हूं. वे मुझे इस विशाल धरती पर रहने देंगे, जिससे मैं अपने माता-पिता को देख सकूं. (२)
I call the name of agni first of the gods. They will let me live on this vast earth, so that I can see my parents. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒भि त्वा॑ देव सवित॒रीशा॑नं॒ वार्या॑णाम् । सदा॑वन्भा॒गमी॑महे ॥ (३)
हे सदा रक्षा करने वाले सूर्य देव! तुम उत्तम धन के स्वामी हो, इसलिए मैं तुमसे उपभोग करने योग्य धन मांगता हूं. (३)
O the sun god who always protects! You are the master of the best wealth, so I ask you for consumable wealth. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यश्चि॒द्धि त॑ इ॒त्था भगः॑ शशमा॒नः पु॒रा नि॒दः । अ॒द्वे॒षो हस्त॑योर्द॒धे ॥ (४)
हे सूर्य! तुम अपने दोनों हाथों में उपभोग के योग्य धन को धारण करते हो. वह सबके द्वारा प्रशंसित है. उससे कोई द्वेष नहीं रखता. (४)
O sun! You hold the money you are eligible for consumption in both your hands. He is admired by everyone. There is no hatred for him. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
भग॑भक्तस्य ते व॒यमुद॑शेम॒ तवाव॑सा । मू॒र्धानं॑ रा॒य आ॒रभे॑ ॥ (५)
हे सूर्य देव! तुम धन के स्वामी हो. यदि तुम रक्षा करो तो हम धन की उन्नति करने में लग जावें. (५)
O Sun God! You are the master of wealth. If you protect, let us go into the advancement of wealth. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
न॒हि ते॑ क्ष॒त्रं न सहो॒ न म॒न्युं वय॑श्च॒नामी प॒तय॑न्त आ॒पुः । नेमा आपो॑ अनिमि॒षं चर॑न्ती॒र्न ये वात॑स्य प्रमि॒नन्त्यभ्व॑म् ॥ (६)
हे वरुण देव! आकाश में उड़ने वाले पक्षियों में भी तुम्हारे समान शक्ति और पराक्रम नहीं है. इन्हें तुम्हारे बराबर क्रोध भी नहीं मिला है. सर्वदा चलने वाली वायु और बहने वाला जल तुम्हारी गति से आगे नहीं बढ़ सकता. (६)
O Varun Dev! The birds that fly in the sky do not have the same power and valour as you. They haven't even got the same anger as you. The ever-moving wind and the flowing water cannot move at your own pace. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒बु॒ध्ने राजा॒ वरु॑णो॒ वन॑स्यो॒र्ध्वं स्तूपं॑ ददते पू॒तद॑क्षः । नी॒चीनाः॑ स्थुरु॒परि॑ बु॒ध्न ए॑षाम॒स्मे अ॒न्तर्निहि॑ताः के॒तवः॑ स्युः ॥ (७)
शुद्ध बल के स्वामी वरुण मूलरहित आकाश में ठहर कर उत्तम तेज के समूह को ऊपर ही ऊपर धारण करते हैं. उस तेजसमूह की किरणों का मुख नीचे और जड़ें ऊपर हैं. उन्हीं के कारण हममें प्राण स्थित रहते हैं. (७)
Varuna, the lord of pure force, stays in the original sky and holds the group of the best of bright ones above the top. The rays of that bright group are facing down and the roots are up. Because of them, we have life in us. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उ॒रुं हि राजा॒ वरु॑णश्च॒कार॒ सूर्या॑य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑ । अ॒पदे॒ पादा॒ प्रति॑धातवेऽकरु॒ताप॑व॒क्ता हृ॑दया॒विध॑श्चित् ॥ (८)
राजा वरुण ने सूर्य के उदय से अस्त तक चलने के लिए मार्ग का विस्तार किया है. उसने आकाश में बिना पैरों वाले सूर्य के चलने के लिए मार्ग बनाया है. वे मेरे हृदय का भेदन करने वाले शत्रु का नाश करें. (८)
King Varuna has extended the path from the rise of the sun to the setting. He has made way for the sun to walk without feet in the sky. Let them destroy the enemy who pierces my heart. (8)