हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.64.12

मंडल 1 → सूक्त 64 → श्लोक 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 64
घृषुं॑ पाव॒कं व॒निनं॒ विच॑र्षणिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा॑ गृणीमसि । र॒ज॒स्तुरं॑ त॒वसं॒ मारु॑तं ग॒णमृ॑जी॒षिणं॒ वृष॑णं सश्चत श्रि॒ये ॥ (१२)
हम शत्रुबलनाशक, सबके पवित्रकर्ता, वर्षाकारक, सबके देखने वाले एवं रुद्रपुत्र मरुद्गण की स्तुति स्तोत्रों द्वारा करते हैं. हे यजमानो! तुम भी धनप्राप्ति के निमित्त धूल उड़ाने वाले, बल संपन्न ऋजीष नामक यज्ञ में आहूत तथा कामवर्षक मरुतों के समीप जाओ. (१२)
We praise the destroyer of enemies, the purifier of all, the rainy one, the beholder of all and the son of Rudra through stotras. O hosts! You should also go near the dead who blow dust for the sake of wealth, called in a sacrifice called The Mighty Rishish and the working months. (12)