ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र नू स मर्तः॒ शव॑सा॒ जना॒ँ अति॑ त॒स्थौ व॑ ऊ॒ती म॑रुतो॒ यमाव॑त । अर्व॑द्भि॒र्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभि॑रा॒पृच्छ्यं॒ क्रतु॒मा क्षे॑ति॒ पुष्य॑ति ॥ (१३)
हे मरुद्गण! तुम्हारा आश्रय एवं रक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति सब मनुष्यों से अधिक बलवान् बन जाता है, वह घोड़ों की सहायता से अन्न एवं अपने सेवकों की सहायता से धनलाभ करता है. वह शोभन यज्ञों का अनुष्ठानकर्ता एवं प्रजा, पुत्र आदि से संपन्न बनता है. (१३)
O deserters! The one who receives your shelter and protection becomes stronger than all men, he makes riches with the help of food and his servants with the help of horses. He is the ritualist of Shobhan yajnas and is endowed with the people, son, etc. (13)