ऋग्वेद (मंडल 1)
च॒र्कृत्यं॑ मरुतः पृ॒त्सु दु॒ष्टरं॑ द्यु॒मन्तं॒ शुष्मं॑ म॒घव॑त्सु धत्तन । ध॒न॒स्पृत॑मु॒क्थ्यं॑ वि॒श्वच॑र्षणिं तो॒कं पु॑ष्येम॒ तन॑यं श॒तं हिमाः॑ ॥ (१४)
हे मरुद्गण! तुम हव्यदाता यजमानो को ऐसे पुत्र देते हो जो सभी कार्य करने में कुशल, संग्रामों में अजेय, तेजस्वी, शत्रुनाशक, धनसंपन्न, प्रशंसापात्र एवं सर्वज्ञ हों. हम इस प्रकार के पुत्र एवं पौत्रों को सौ वर्ष जीवित रखेंगे. (१४)
O deserters! You give the wise hosts sons who are skilled in doing all things, invincible in wars, brilliant, hostile, wealthy, praiseworthy and omniscient. We will keep these kinds of sons and grandsons alive for a hundred years. (14)