हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.87.2

मंडल 1 → सूक्त 87 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 87
उ॒प॒ह्व॒रेषु॒ यदचि॑ध्वं य॒यिं वय॑ इव मरुतः॒ केन॑ चित्प॒था । श्चोत॑न्ति॒ कोशा॒ उप॑ वो॒ रथे॒ष्वा घृ॒तमु॑क्षता॒ मधु॑वर्ण॒मर्च॑ते ॥ (२)
हे मरुदगणो! जिस प्रकार पक्षी आकाशमार्ग से शीघ्र चलते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे समीपवर्ती आकाश में जब चलते हुए बादलों को एकत्र करते हो तो मेघ तुम्हारे रथों से लिपटकर पानी बरसाने लगते हैं. इसी हेतु तुम अपनी पूजा करने वाले यजमानों पर मधु के समान स्वच्छ जल बरसाओ. (२)
O the deserters! Just as the birds walk quickly through the sky, so when you gather the clouds in the sky near us, the clouds cling to your chariots and start raining water. For this reason, you should rain clean water like honey on the hosts who worship you. (2)