हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.87.4

मंडल 1 → सूक्त 87 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 87
स हि स्व॒सृत्पृष॑दश्वो॒ युवा॑ ग॒णो॒३॒॑ऽया ई॑शा॒नस्तवि॑षीभि॒रावृ॑तः । असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒यावाने॑द्यो॒ऽस्या धि॒यः प्रा॑वि॒ताथा॒ वृषा॑ ग॒णः ॥ (४)
स्वयं प्रेरित, सफेद बुंदकियों युक्त हरिणियों वाले, नित्य तरुण, असाधारण शक्तिसंपन्न, सत्यकर्मा, स्तोताओं को ऋणमुक्त करने वाले, अनिंदित एवं जलवर्षक मरुद्गण हमारे यज्ञ की रक्षा करते हैं. (४)
Self-inspired, white-bunked deer, the eternal youth, the extraordinary powerful, the Satyakarma, the debt-freer to the stothas, the unincorporated and water-year-olds protect our yajna. (4)