ऋग्वेद (मंडल 10)
क॒दा व॑सो स्तो॒त्रं हर्य॑त॒ आव॑ श्म॒शा रु॑ध॒द्वाः । दी॒र्घं सु॒तं वा॒ताप्या॑य ॥ (१)
हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! हमारा स्तोत्र तुझ कामना करने वाले को कब रोकेगा? जिस प्रकार खेत की नालियां जलपूर्ण होती हैं. उसी प्रकार जल प्राप्त करने के लिए अधिक सोमरस निचोड़ा गया है. (१)
O Indra, who gives the abode! When will our psalm stop the one who desires you? The way the drains of the field are watery. In the same way more somras have been squeezed to get water. (1)