हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.113.1

मंडल 10 → सूक्त 113 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 113
तम॑स्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी सचे॑तसा॒ विश्वे॑भिर्दे॒वैरनु॒ शुष्म॑मावताम् । यदैत्कृ॑ण्वा॒नो म॑हि॒मान॑मिन्द्रि॒यं पी॒त्वी सोम॑स्य॒ क्रतु॑माँ अवर्धत ॥ (१)
द्यावा-पृथिवी सब देशों के साथ मिलकर एकचित्त से इंद्र की शक्ति की रक्षा करें. जब वीरता के कार्य करतेकरते इंद्र ने अपना महत्त्व प्राप्त किया, तब सोमरस पीने वाले एवं कर्मकर्ता इंद्र बढ़े. (१)
The dyava-prithvis should work together with all the countries to protect the power of Indra from the unison. When Indra gained his importance while doing acts of bravery, indra, the somras drinker and the karmakarma, grew up. (1)