हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.114.2

मंडल 10 → सूक्त 114 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
ति॒स्रो दे॒ष्ट्राय॒ निरृ॑ती॒रुपा॑सते दीर्घ॒श्रुतो॒ वि हि जा॒नन्ति॒ वह्न॑यः । तासां॒ नि चि॑क्युः क॒वयो॑ नि॒दानं॒ परे॑षु॒ या गुह्ये॑षु व्र॒तेषु॑ ॥ (२)
यजमान हव्य देने के लिए अग्नि, सूर्य और वायु की उपासना करते हैं. इसके बाद परम यशस्वी देव इन्हें जानते हैं. विद्वान्‌ लोग इनका आदि कारण जानते हैं एवं परम गोपनीय व्रतों में संलग्न रहते हैं. (२)
Hosts worship agni, sun and air to give a havya. After this, the most successful God knows them. The learned people know the original reason for these and engage in the most secret fasts. (2)