ऋग्वेद (मंडल 10)
सु॒प॒र्णं विप्राः॑ क॒वयो॒ वचो॑भि॒रेकं॒ सन्तं॑ बहु॒धा क॑ल्पयन्ति । छन्दां॑सि च॒ दध॑तो अध्व॒रेषु॒ ग्रहा॒न्सोम॑स्य मिमते॒ द्वाद॑श ॥ (५)
क्रांतदर्शी विद्वान् परमात्मारूपी एक ही पक्षी को अनेक प्रकार के वचनों से वर्णित करते हैं. वे यज्ञों में भांति-भांति के छंदों की रचना करते हैं तथा सोमरस के बारह पात्रों को स्थापित करते हैं. (५)
The kratandarsophys describe the same bird as divine with a variety of words. They compose a variety of verses in the yagnas and establish the twelve characters of the Somras. (5)