ऋग्वेद (मंडल 10)
उप॑ ते॒ गा इ॒वाक॑रं वृणी॒ष्व दु॑हितर्दिवः । रात्रि॒ स्तोमं॒ न जि॒ग्युषे॑ ॥ (८)
हे रात्रि! तुम आकाश की कन्या हो. मुझ शत्रुजयी का यह स्तोत्र तुम स्वीकार करो. मैं गाय के समान तुम्हें यह स्तोत्र भेंट कर रहा हूं. (८)
O night! You are the virgo of the sky. Accept this psalm of my enemy. I am offering you this hymn like a cow. (8)