हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.158.2

मंडल 10 → सूक्त 158 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 158
जोषा॑ सवित॒र्यस्य॑ ते॒ हरः॑ श॒तं स॒वाँ अर्ह॑ति । पा॒हि नो॑ दि॒द्युतः॒ पत॑न्त्याः ॥ (२)
हे सविता! हमारी स्तुतियां स्वीकार करो. तुम्हारा तेज अनेक यज्ञों को पाने की योग्यता रखता है. तुम शत्रुओं के गिरते हुए उज्ज्वल आयुधों से हमारी रक्षा करो. (२)
O Savita! Accept our praises. Your speed is capable of getting many yagnas. You protect us from the falling bright weapons of enemies. (2)