हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 185
महि॑ त्री॒णामवो॑ऽस्तु द्यु॒क्षं मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः । दु॒रा॒धर्षं॒ वरु॑णस्य ॥ (१)
वरुण, मित्र एवं अर्यमा-इन तीन देवों का दीप्तिशाली, अपराजेय एवं महान्‌ रक्षण हमें प्राप्त हो. (१)
Varuna, friends and Ariyama - may we receive the glorious, invincible and great protection of these three gods. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 185
न॒हि तेषा॑म॒मा च॒न नाध्व॑सु वार॒णेषु॑ । ईशे॑ रि॒पुर॒घशं॑सः ॥ (२)
वरुण, अर्यमा एवं मित्र द्वारा अनुगृहीत स्तोताओं को घर, मार्ग एवं दुर्गम स्थान में बुरा चाहने वाला शत्रु नहीं दबा सकता. (२)
The enemies who want to be evil in the house, the road and the inaccessible places cannot suppress the hymns adopted by Varun, Aryama and mitra. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 185
यस्मै॑ पु॒त्रासो॒ अदि॑तेः॒ प्र जी॒वसे॒ मर्त्या॑य । ज्योति॒र्यच्छ॒न्त्यज॑स्रम् ॥ (३)
अदिति के ये तीनों पुत्र जिसके जीवन के लिए ज्योति प्रदान करते हैं, उस पर शत्रु का अधिकार नहीं होता. (३)
The three sons of Aditi for whose life they provide light, the enemy does not have the right over him. (3)