ऋग्वेद (मंडल 10)
को वः॒ स्तोमं॑ राधति॒ यं जुजो॑षथ॒ विश्वे॑ देवासो मनुषो॒ यति॒ ष्ठन॑ । को वो॑ऽध्व॒रं तु॑विजाता॒ अरं॑ कर॒द्यो नः॒ पर्ष॒दत्यंहः॑ स्व॒स्तये॑ ॥ (६)
हे देवो! मेरे अतिरिक्त कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है, जिसकी तुम सेवा करो? हे ज्ञाता देवो! तुम संतान वाले बनो. मेरे अतिरिक्त कौन यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारा यज्ञ अलंकृत करता है. यज्ञ हमें पाप से बचाकर हमारा कल्याण करता है. (६)
Oh, God! Who can praise you besides Me, whom you serve? O god of the knower! You become the child. Who besides Me adorns your yajna by host hymns? Yajna does us well by saving us from sin. (6)