ऋग्वेद (मंडल 10)
अ॒ग्निर्न ये भ्राज॑सा रु॒क्मव॑क्षसो॒ वाता॑सो॒ न स्व॒युजः॑ स॒द्यऊ॑तयः । प्र॒ज्ञा॒तारो॒ न ज्येष्ठाः॑ सुनी॒तयः॑ सु॒शर्मा॑णो॒ न सोमा॑ ऋ॒तं य॒ते ॥ (२)
मरुद्गण अग्नि के समान तेज से सुशोभित, स्वर्णालंकारों से युक्त वक्षःस्थल वाले, वायु के समान स्वयं मिलने वाले व शीघ्र गतिशाली, उत्तम ज्ञानियों के समान पूज्य तथा शोभन नयन एवं मुख वाले सोम के समान यज्ञ में जाते हैं. (२)
Deserts go to the yagna like a som with a warm and adorned with agni, with a breast-place with golden ornaments, self-fulfilling and quick-moving, like the best wise, as the best wise, and adorned like the som with the mouth. (2)