ऋग्वेद (मंडल 10)
वाता॑सो॒ न ये धुन॑यो जिग॒त्नवो॑ऽग्नी॒नां न जि॒ह्वा वि॑रो॒किणः॑ । वर्म॑ण्वन्तो॒ न यो॒धाः शिमी॑वन्तः पितॄ॒णां न शंसाः॑ सुरा॒तयः॑ ॥ (३)
मरुद्गण वायु के समान शन्रुओं को कंपित करने वाले व गतिशील, अग्नि की ज्वालाओं के समान सुंदर मुख वाले, कवचधारी योद्धाओं के समान शर्य कर्म करने वाले एवं पितरों के वचनों के समान शोभन दानी हैं. (३)
Marudgans shake the enemies, moving as the wind, with beautiful faces like flames of agni, perform gallantry deeds like armored warriors, and adorning the words of the pitars (ancestors). (3)