ऋग्वेद (मंडल 10)
स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः । अनु॑ दह स॒हमू॑रान्क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः ॥ (१९)
हे अग्नि! तुम बहुत समय से राक्षसों को बाधा पहुंचा रहे हो. राक्षस तुम्हें युद्ध में नहीं जीत पाए. तुम मांसभक्षक राक्षसों को समूल नष्ट करो. वे तुम्हारे दिव्य आयुधों से बच न सकें. (१९)
O agni! You've been interrupting monsters for a long time. The monsters didn't win you over in the war. You destroy the meat-eating monsters altogether. They cannot escape your divine weapons. (19)