हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.95.1

मंडल 10 → सूक्त 95 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 95
ह॒ये जाये॒ मन॑सा॒ तिष्ठ॑ घोरे॒ वचां॑सि मि॒श्रा कृ॑णवावहै॒ नु । न नौ॒ मन्त्रा॒ अनु॑दितास ए॒ते मय॑स्कर॒न्पर॑तरे च॒नाह॑न् ॥ (१)
पुरूरवा ने कहा-“हे दुःख देने वाली पत्नी! अनुरागपूर्ण मन से क्षण भर मेरे समीप ठहरो. हम आज शीघ्र ही कथोपकथन करें. आज यदि हमारी बातें अनकही रह गई तो आने वाले दिन सुखकारक नहीं होंगे.” (१)
Pururva said, "O wife of sorrow! Stay close to me for a moment with a loving heart. Let's make a fuss today soon. Today, if our words are left unsaid, the days to come will not be pleasant." (1)