ऋग्वेद (मंडल 10)
या ओष॑धीः॒ पूर्वा॑ जा॒ता दे॒वेभ्य॑स्त्रियु॒गं पु॒रा । मनै॒ नु ब॒भ्रूणा॑म॒हं श॒तं धामा॑नि स॒प्त च॑ ॥ (१)
जो ओषधियां प्राचीन काल में तीन युगों में देवों से उत्पन्न हुई हैं, मैं मानता हूं कि वे पीले रंग की ओषधियां एक सौ सात स्थानों में स्थित हैं. (१)
The herbs that originated from the gods in three ages in ancient times, I believe that those yellow-colored herbs are located in one hundred and seven places. (1)
ऋग्वेद (मंडल 10)
श॒तं वो॑ अम्ब॒ धामा॑नि स॒हस्र॑मु॒त वो॒ रुहः॑ । अधा॑ शतक्रत्वो यू॒यमि॒मं मे॑ अग॒दं कृ॑त ॥ (२)
हे माता के समान ओषधियो! तुम्हारे जन्म सौ एवं तुम्हारे प्ररोहण हजार हैं. हे सौ कर्मो वाली ओषधियो! तुम मुझे निरोग करो. (२)
O mother-like drugs! Your births are hundred and your ascents are thousand. O a hundred-doers! You make me healthy. (2)
ऋग्वेद (मंडल 10)
ओष॑धीः॒ प्रति॑ मोदध्वं॒ पुष्प॑वतीः प्र॒सूव॑रीः । अश्वा॑ इव स॒जित्व॑रीर्वी॒रुधः॑ पारयि॒ष्ण्वः॑ ॥ (३)
हे फूल और फल वाली ओषधियो! तुम इस रोगी के प्रति प्रसन्न बनो. तुम अश्चों के समान जयशील, उत्पन्न होने वाली एवं रोगियों को रोगों से पार करने वाली हो. (३)
O flowers and fruit-bearing herbs! Be pleased with this patient. You are as joyful as the ashes, the one who arises and the patients are about to overcome diseases. (3)
ऋग्वेद (मंडल 10)
ओष॑धी॒रिति॑ मातर॒स्तद्वो॑ देवी॒रुप॑ ब्रुवे । स॒नेय॒मश्वं॒ गां वास॑ आ॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष ॥ (४)
हे माता के समान दिव्य ओषधियो! मैं तुम्हारे संबंधी वैद्य से इस प्रकार कहता हूं-“हे चिकित्सक! मैं तुम्हें घोड़ा, गाय, वस्त्र एवं स्वयं को दे सकता हूं.” (४)
O divine medicines like mother! I say to your relative's physician like this: "O doctor! I can give you a horse, a cow, a garment and myself." (4)
ऋग्वेद (मंडल 10)
अ॒श्व॒त्थे वो॑ नि॒षद॑नं प॒र्णे वो॑ वस॒तिष्कृ॒ता । गो॒भाज॒ इत्किला॑सथ॒ यत्स॒नव॑थ॒ पूरु॑षम् ॥ (५)
हे ओषधियो! तुम पीपल के वृक्ष पर रहती हो एवं पलाश वृक्ष पर तुम्हारा निवासस्थान है. जब तुम रोगी पुरुष पर कृपा करती हो, तब तुम गाय पाने की अधिकारिणी बनती हो. (५)
O ladies! You live on the peepal tree and on the Palash tree is your abode. When you have mercy on a sick man, you become the right to get a cow. (5)
ऋग्वेद (मंडल 10)
यत्रौष॑धीः स॒मग्म॑त॒ राजा॑नः॒ समि॑ताविव । विप्रः॒ स उ॑च्यते भि॒षग्र॑क्षो॒हामी॑व॒चात॑नः ॥ (६)
युद्ध में एकत्र होने वाले राजा लोगों के समान जिस व्यक्ति के पास सभी ओषधियां होती हैं, उसे ब्राह्मण या भिषक् कहते हैं. वह रोगों का नाश करता है. (६)
Like the kings who gather in war, the person who has all the herbs is called a Brahmin or a bhishka. He destroys diseases. (6)
ऋग्वेद (मंडल 10)
अ॒श्वा॒व॒तीं सो॑माव॒तीमू॒र्जय॑न्ती॒मुदो॑जसम् । आवि॑त्सि॒ सर्वा॒ ओष॑धीर॒स्मा अ॑रि॒ष्टता॑तये ॥ (७)
मैं इस रोग का विनाश करने के लिए अश्ववती, सोमवती, ऊर्जयंती, उदोजस आदि सभी ओषधियों की स्तुति करता हूं. (७)
I praise all the herbs like Ashwavati, Somvati, Urjayanti, Udojas etc. for destroying this disease. (7)
ऋग्वेद (मंडल 10)
उच्छुष्मा॒ ओष॑धीनां॒ गावो॑ गो॒ष्ठादि॑वेरते । धनं॑ सनि॒ष्यन्ती॑नामा॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष ॥ (८)
हे रोगी पुरुष! ओषधियों से बल उसी प्रकार बाहर निकलता है, जिस प्रकार गोशाला से गाएं बाहर जाती हैं. ये ओषधियां तुम्हें स्वास्थ्यरूपी धन देती हैं. (८)
O patient man! The force comes out of the herbs in the same way as the cows go out of the goshala. These herbs give you healthy wealth. (8)