ऋग्वेद (मंडल 2)
धा॒रा॒व॒रा म॒रुतो॑ धृ॒ष्ण्वो॑जसो मृ॒गा न भी॒मास्तवि॑षीभिर॒र्चिनः॑ । अ॒ग्नयो॒ न शु॑शुचा॒ना ऋ॑जी॒षिणो॒ भृमिं॒ धम॑न्तो॒ अप॒ गा अ॑वृण्वत ॥ (१)
स्थिर वृक्ष आदि को चंचल करने वाले, अपनी शक्ति से सबको पराजित करने वाले, पशु के समान भयानक, अपने बल द्वारा समस्त संसार को व्याप्त करने वाले, अग्नि के समान दीप्त एवं जल से युक्त मरुद्गण घूमने वाले बादलों को छिन्न-भिन्न करके जल बरसाते हैं. (१)
Those who fickle the still trees, etc., who defeat everyone with their power, are terrible as an animal, who pervade the whole world with their own force, are as bright as agni and the deserts with water, who scatter the swirling clouds and rain water. (1)
ऋग्वेद (मंडल 2)
द्यावो॒ न स्तृभि॑श्चितयन्त खा॒दिनो॒ व्य१॒॑भ्रिया॒ न द्यु॑तयन्त वृ॒ष्टयः॑ । रु॒द्रो यद्वो॑ मरुतो रुक्मवक्षसो॒ वृषाज॑नि॒ पृश्न्याः॑ शु॒क्र ऊध॑नि ॥ (२)
हे सीने पर दीप्त आभरणों वाले मरुद्गण! कामवर्षक रुद्र ने तुम्हें पृश्नि के निर्मल उदर से पैदा किया है. तुम अपने आभूषणों से उसी प्रकार शोभा पाते हो, जिस प्रकार आकाश तारागण से शोभित होता है. शत्रुभक्षक एवं जलवर्षक मरुद्गण बादलों में बिजली के समान प्रकाशित होते हैं. (२)
O the deserts with bright fills on the chest! The workman Rudra created you from the pure belly of the earth. You are adorned with your ornaments in the same way that the sky is adorned with stars. Enemy-eaters and water-year deserts are illuminated like lightning in clouds. (2)
ऋग्वेद (मंडल 2)
उ॒क्षन्ते॒ अश्वा॒ँ अत्या॑ँ इवा॒जिषु॑ न॒दस्य॒ कर्णै॑स्तुरयन्त आ॒शुभिः॑ । हिर॑ण्यशिप्रा मरुतो॒ दवि॑ध्वतः पृ॒क्षं या॑थ॒ पृष॑तीभिः समन्यवः ॥ (३)
जिस प्रकार घोड़े युद्ध में पसीने से धरती सींच देते हैं, उसी प्रकार संसार को सींचने वाले मरुद्गण घोड़े पर चढ़कर गर्जन करते हुए बादल के कान के पास से जल्दी से निकल जाते हैं. सोने के टोप वाले, समान क्रोध वाले एवं वृक्ष कंपित करने वाले मरुतो! तुम काली बूंदों वाली हिरनियों पर चढ़कर हव्य वाले यजमान के पास आते हो. (३)
Just as horses irrigate the earth with sweat in war, so the deserters who irrigate the world quickly get out of the ear of the cloud, climbing on to the horse and roaring. Maruto with a gold hat, with equal anger and a tree shaking! You come up on the greens with black drops to the host with a whiff. (3)
ऋग्वेद (मंडल 2)
पृ॒क्षे ता विश्वा॒ भुव॑ना ववक्षिरे मि॒त्राय॑ वा॒ सद॒मा जी॒रदा॑नवः । पृष॑दश्वासो अनव॒भ्ररा॑धस ऋजि॒प्यासो॒ न व॒युने॑षु धू॒र्षदः॑ ॥ (४)
मरुद्गण हव्यधारक यजमान के लिए मित्र के समान सारा जल ढोकर लाते हैं. मरुद्गण शीघ्र दान करने वाले, श्वेत बिंदुयुक्त अश्चों वाले, भ्रंशरहित धन वाले एवं सीधे चलने वाले घोड़ों की तरह पथिकों के सम्मुख जाते हैं. (४)
The deserters carry all the water for the host like a friend. Deserters face the pathiks like quick donating, white-dotted, without fault-free wealth, and walking straight horses. (4)
ऋग्वेद (मंडल 2)
इन्ध॑न्वभिर्धे॒नुभी॑ र॒प्शदू॑धभिरध्व॒स्मभिः॑ प॒थिभि॑र्भ्राजदृष्टयः । आ हं॒सासो॒ न स्वस॑राणि गन्तन॒ मधो॒र्मदा॑य मरुतः समन्यवः ॥ (५)
हे समान क्रोध वाले एवं दीप्तियुक्त आयुधों वाले मरुद्गण! हंस जिस प्रकार अपने निवासस्थान पर उतरते हैं, उसी प्रकार तुम दुधारू गायों एवं गरजते हुए मेघों के साथ विघ्नरहित पथ से मधुर सोमरस द्वारा प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए आओ. (५)
O the deserts with equal anger and radiant weapons! Just as the swans descend upon their abode, so come to find happiness through the sweet somarahs from the path of disruption with the milch cows and the thundering clouds. (5)
ऋग्वेद (मंडल 2)
आ नो॒ ब्रह्मा॑णि मरुतः समन्यवो न॒रां न शंसः॒ सव॑नानि गन्तन । अश्वा॑मिव पिप्यत धे॒नुमूध॑नि॒ कर्ता॒ धियं॑ जरि॒त्रे वाज॑पेशसम् ॥ (६)
हे समान क्रोध वाले मरुतो! तुम जिस प्रकार हमारी स्तुतियां सुनने आते हो, उसी प्रकार हमारे हव्य अन्न के प्रति आओ. तुम गाय को घोड़ों के समान पुष्ट अंग वाली तथा यजमान का यज्ञ अन्नयुक्त करो. (६)
O Maruto of equal anger! Just as you come to hear Our praises, so come to our good food. You give the cow a strong organ like a horse and the host's yajna. (6)
ऋग्वेद (मंडल 2)
तं नो॑ दात मरुतो वा॒जिनं॒ रथ॑ आपा॒नं ब्रह्म॑ चि॒तय॑द्दि॒वेदि॑वे । इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ वृ॒जने॑षु का॒रवे॑ स॒निं मे॒धामरि॑ष्टं दु॒ष्टरं॒ सहः॑ ॥ (७)
हे मरुद्गण! हमें अन्न के साथ-साथ ऐसा पुत्र भी प्रदान करो जो तुम्हारे आने के समय प्रतिदिन तुम्हारा गुणगान करे. अपने स्तुतिकर्ता को तुम अन्न दो. जो लोग युद्ध में तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें युद्ध ज्ञान, धन देने की शक्ति एवं शत्रुओं द्वारा अधृष्य एवं असहनीय बल दो. (७)
O deserters! Give us food as well as a Son who praises you every day at the time of your coming. Give food to your praiseor. Give those who praise you in war, the wisdom of war, the power to give money, and the power of the enemies to be unbearable and intolerable. (7)
ऋग्वेद (मंडल 2)
यद्यु॒ञ्जते॑ म॒रुतो॑ रु॒क्मव॑क्ष॒सोऽश्वा॒न्रथे॑षु॒ भग॒ आ सु॒दान॑वः । धे॒नुर्न शिश्वे॒ स्वस॑रेषु पिन्वते॒ जना॑य रा॒तह॑विषे म॒हीमिष॑म् ॥ (८)
सीने पर चमकीले गहने पहनने वाले एवं शोभन दानयुक्त मरुद्गण रथ पर सवार होते ही यजमान के घर जाकर उसी प्रकार यथेष्ट अन्न देते हैं, जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को दूध पिलाती है. (८)
As soon as the marudgans, who wear bright ornaments on their chests and adorn the daan, ride on the chariot, they go to the host's house and give the food worthy, just as the cow feeds its calf. (8)