ऋग्वेद (मंडल 2)
हस्ते॑व श॒क्तिम॒भि सं॑द॒दी नः॒ क्षामे॑व नः॒ सम॑जतं॒ रजां॑सि । इ॒मा गिरो॑ अश्विना युष्म॒यन्तीः॒ क्ष्णोत्रे॑णेव॒ स्वधि॑तिं॒ सं शि॑शीतम् ॥ (७)
हे अश्विनीकुमारो! हाथों के समान हमें सामर्थ्य दो एवं धरती-आकाश के समान जल प्रदान करो. हमारे द्वारा की गई स्तुतियां तुम्हारे समीप जाती हैं. सान जिस प्रकार तलवार को तेज कर देती है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को तीक्ष्ण बनाओ. (७)
O Ashwinikumaro! Give us strength as hands and give us water like earth and sky. The praises we have made go near you. Just as San sharpens the sword, so do you sharpen our praises. (7)