ऋग्वेद (मंडल 3)
अजी॑जनन्न॒मृतं॒ मर्त्या॑सोऽस्रे॒माणं॑ त॒रणिं॑ वी॒ळुज॑म्भम् । दश॒ स्वसा॑रो अ॒ग्रुवः॑ समी॒चीः पुमां॑सं जा॒तम॒भि सं र॑भन्ते ॥ (१३)
मरणधर्मा ऋत्विजों ने अमर, क्षयरहित, दृढ़ दांतों वाले तथा पापोद्धारक अग्नि को जन्म दिया है. जिस प्रकार पुत्र जन्म पर लोग हर्षसूचक शब्द करते हैं, उसी प्रकार दस उंगलियां मिलकर अग्नि की उत्पत्ति पर शब्द करती हैं. (१३)
The mortals have given birth to immortal, decayless, firm-toothed and sinful agni. Just as people make joyous words at the birth of a son, so ten fingers together speak on the origin of agni. (13)