हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.31.4

मंडल 3 → सूक्त 31 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
अ॒भि जैत्री॑रसचन्त स्पृधा॒नं महि॒ ज्योति॒स्तम॑सो॒ निर॑जानन् । तं जा॑न॒तीः प्रत्युदा॑यन्नु॒षासः॒ पति॒र्गवा॑मभव॒देक॒ इन्द्रः॑ ॥ (४)
विजयी मरुद्गण वृत्र के साथ युद्ध करते हुए इंद्र के साथ मिल गए थे. वृत्र के मरने पर मरुतों ने उससे निकलने वाली सूर्य नामक महान्‌ ज्योति को जाना. वृत्रहंता इंद्र को सूर्य जानती हुई उषाएं उसके समीप गई. इस प्रकार इंद्र अकेले ही सारी किरणों के पति हुए. (४)
The victorious deserters had joined indra while at war with Vrithra. When Vritra died, the Maruts came to know the great light called the Sun emanating from it. The ushas, knowing The Sun, went near indra. Thus Indra became the husband of all rays alone. (4)