ऋग्वेद (मंडल 3)
इ॒म इ॑न्द्र भर॒तस्य॑ पु॒त्रा अ॑पपि॒त्वं चि॑कितु॒र्न प्र॑पि॒त्वम् । हि॒न्वन्त्यश्व॒मर॑णं॒ न नित्यं॒ ज्या॑वाजं॒ परि॑ णयन्त्या॒जौ ॥ (२४)
हे इंद्र! भरतवंशी-क्षत्रिय वशिष्ठ दूर होना जानते हैं, मिलना नहीं जानते. वे संग्राम में वशिष्ठगोत्रीय जनों के प्रति सच्चे शत्रु के समान घोड़े दौड़ाते हैं एवं धनुष उठाते हैं. (२४)
O Indra! Bharatvanshi-Kshatriya Vashishtha knows how to be away, not to meet. They run horses like a true enemy towards the Vashishthagotrians in the battle and raise bows. (24)