हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.62.4

मंडल 3 → सूक्त 62 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
बृह॑स्पते जु॒षस्व॑ नो ह॒व्यानि॑ विश्वदेव्य । रास्व॒ रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥ (४)
हे सब देवों के हितकारी बृहस्पति! इन लोगों के हव्य का सेवन करो एवं यजमान को उत्तम धन दो. (४)
O Jupiter, the benefactor of all the gods! Eat the havya of these people and give the host the best money. (4)