हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
इ॒मा उ॑ वां भृ॒मयो॒ मन्य॑माना यु॒वाव॑ते॒ न तुज्या॑ अभूवन् । क्व१॒॑ त्यदि॑न्द्रावरुणा॒ यशो॑ वां॒ येन॑ स्मा॒ सिनं॒ भर॑थः॒ सखि॑भ्यः ॥ (१)
हे इंद्र व वरुण! शत्रुओं द्वारा सताई हुई एवं घूमती हुई तुम्हारी प्रजाएं बलवान्‌ शत्रुओं द्वारा नष्ट न हो जावें. तुम्हारा वह यश कहां है, जिससे तुम हम मित्रों को अन्न देते हो? (१)
O Indra and Varun! Let not your people, persecuted and roamed by enemies, be destroyed by the enemies. Where is your glory that you give food to our friends? (1)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
अ॒यमु॑ वां पुरु॒तमो॑ रयी॒यञ्छ॑श्वत्त॒ममव॑से जोहवीति । स॒जोषा॑विन्द्रावरुणा म॒रुद्भि॑र्दि॒वा पृ॑थि॒व्या श‍ृ॑णुतं॒ हवं॑ मे ॥ (२)
हे इंद्र व वरुण! धन का इच्छुक एवं महान्‌ यजमान अपनी रक्षा के लिए तुम दोनों को सदा बुलाता है. तुम दोनों मरुतों, द्युलोक एवं धरती के साथ मिलकर मेरी स्तुति सुनो. (२)
O Indra and Varun! The seeker of wealth and the great host always calls upon both of you to protect himself. Listen to My praise together with the two of you, the Maruts, the Dolokas and the Earth. (2)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
अ॒स्मे तदि॑न्द्रावरुणा॒ वसु॑ ष्याद॒स्मे र॒यिर्म॑रुतः॒ सर्व॑वीरः । अ॒स्मान्वरू॑त्रीः शर॒णैर॑वन्त्व॒स्मान्होत्रा॒ भार॑ती॒ दक्षि॑णाभिः ॥ (३)
हे इंद्र व वरुण! हमारे पास मनचाहा उत्तम धन हो. हे मरुतो! हमारे पास सब काम में कुशल एवं वीर पुत्र हों एवं देवपत्नियां वर देकर हमारी रक्षा करें. अग्निपत्नी होत्रा एवं सूर्यपत्नी भारती दक्षिणा के रूप में गाएं देकर हमारी रक्षा करें. (३)
O Indra and Varun! We have the best money we want. O Maruto! We have good and heroic sons in all the work and protect us by giving them wives. Protect us by singing as Agnipatti Hotra and Suryapatti Bharati Dakshina. (3)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
बृह॑स्पते जु॒षस्व॑ नो ह॒व्यानि॑ विश्वदेव्य । रास्व॒ रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥ (४)
हे सब देवों के हितकारी बृहस्पति! इन लोगों के हव्य का सेवन करो एवं यजमान को उत्तम धन दो. (४)
O Jupiter, the benefactor of all the gods! Eat the havya of these people and give the host the best money. (4)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
शुचि॑म॒र्कैर्बृह॒स्पति॑मध्व॒रेषु॑ नमस्यत । अना॒म्योज॒ आ च॑के ॥ (५)
हे ऋत्विजो! तुम यज्ञ में स्तुतियों द्वारा पवित्र बृहस्पति की सेवा करो. मैं उनसे वह बल मांगता हूं, जिसे शत्रु न हरा सकें. (५)
Hey Ritvijo! You serve the Holy Jupiter by the praises in the yajna. I ask them for the strength that the enemy cannot defeat. (5)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
वृ॒ष॒भं च॑र्षणी॒नां वि॒श्वरू॑प॒मदा॑भ्यम् । बृह॒स्पतिं॒ वरे॑ण्यम् ॥ (६)
कामवर्षी, विश्वरूप नामक बैल की सवारी वाले, तिरस्कार न करने योग्य एवं सबके सेवा योग्य बृहस्पति से मैं मनचाहा फल मांगता हूं. (६)
I ask for the desired fruit from a lustful, undeserved and serviceable Jupiter, riding a bull named Vishwaroop. (6)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
इ॒यं ते॑ पूषन्नाघृणे सुष्टु॒तिर्दे॑व॒ नव्य॑सी । अ॒स्माभि॒स्तुभ्यं॑ शस्यते ॥ (७)
हे पूषादेव! यह अतिशय नवीन एवं शोभन स्तुति तुम्हारे लिए है. इसे हम तुम्हारे निमित्त बोलते हैं. (७)
O God, My God! This is a very new and soothing praise for you. We speak it for you. (7)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
तां जु॑षस्व॒ गिरं॒ मम॑ वाज॒यन्ती॑मवा॒ धिय॑म् । व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम् ॥ (८)
हे पूषा! तुम मेरी स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार करो. कामी पुरुष जिस प्रकार नारी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तुति के सामने आओ. (८)
O God! You accept my praiseworthy voice. Just as the kaami man approaches the woman, so come before the full praise of my desire for food. (8)
Page 1 of 3Next →