ऋग्वेद (मंडल 3)
शुचि॑म॒र्कैर्बृह॒स्पति॑मध्व॒रेषु॑ नमस्यत । अना॒म्योज॒ आ च॑के ॥ (५)
हे ऋत्विजो! तुम यज्ञ में स्तुतियों द्वारा पवित्र बृहस्पति की सेवा करो. मैं उनसे वह बल मांगता हूं, जिसे शत्रु न हरा सकें. (५)
Hey Ritvijo! You serve the Holy Jupiter by the praises in the yajna. I ask them for the strength that the enemy cannot defeat. (5)