ऋग्वेद (मंडल 3)
तां जु॑षस्व॒ गिरं॒ मम॑ वाज॒यन्ती॑मवा॒ धिय॑म् । व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम् ॥ (८)
हे पूषा! तुम मेरी स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार करो. कामी पुरुष जिस प्रकार नारी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तुति के सामने आओ. (८)
O God! You accept my praiseworthy voice. Just as the kaami man approaches the woman, so come before the full praise of my desire for food. (8)