हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
अ॒हं मनु॑रभवं॒ सूर्य॑श्चा॒हं क॒क्षीवा॒ँ ऋषि॑रस्मि॒ विप्रः॑ । अ॒हं कुत्स॑मार्जुने॒यं न्यृ॑ञ्जे॒ऽहं क॒विरु॒शना॒ पश्य॑ता मा ॥ (१)
मैं ही मनु था. मैं ही सविता हूं. मेधावी कक्षीवान्‌ ऋषि भी मैं ही हूं. मैंने अर्जुनी के पुत्र कुत्स को अलंकृत किया था. मैं ही उशना कवि हूं. हे मनुष्यो! मुझे देखो. (१)
I was the only Manu. I am Savita. The meritorious Kandhivan Rishi is also me. I had embellished Arjuni's son Kutsa. I am the same as the ushana poet. O men! Look at me. (1)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
अ॒हं भूमि॑मददा॒मार्या॑या॒हं वृ॒ष्टिं दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य । अ॒हम॒पो अ॑नयं वावशा॒ना मम॑ दे॒वासो॒ अनु॒ केत॑मायन् ॥ (२)
मैंने आर्य मनु के लिए धरती दी थी. हव्य देने वाले लोगों को वर्षारूपी जल मैं ही देता हूं. मैं कलकल शब्द करते हुए जल को सभी स्थानों पर लाया था. देवगण मेरे ही संकल्प का अनुगमन करते हैं. (२)
I gave the earth for Arya Manu. I give rain water to the people who give the greetings. I had brought water to all the places while doing the word kalkal. The gods follow my own resolve. (2)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
अ॒हं पुरो॑ मन्दसा॒नो व्यै॑रं॒ नव॑ सा॒कं न॑व॒तीः शम्ब॑रस्य । श॒त॒त॒मं वे॒श्यं॑ स॒र्वता॑ता॒ दिवो॑दासमतिथि॒ग्वं यदाव॑म् ॥ (३)
मैंने सोमरस पीने से मतवाला होकर शंबर असुर के निन्यानवे नगरों को एक ही साथ नष्ट कर दिया है. मैंने यज्ञ में अतिथियों का स्वागत-सत्कार करने वाले दिवोदास को सौ सागर दिए थे. (३)
I have destroyed the ninety-nine cities of SambarAs at the same time, nauseating by drinking somras. I had given a hundred seas to Divodas, who welcomed the guests to the yagna. (3)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
प्र सु ष विभ्यो॑ मरुतो॒ विर॑स्तु॒ प्र श्ये॒नः श्ये॒नेभ्य॑ आशु॒पत्वा॑ । अ॒च॒क्रया॒ यत्स्व॒धया॑ सुप॒र्णो ह॒व्यं भर॒न्मन॑वे दे॒वजु॑ष्टम् ॥ (४)
हे मरुद्गण! श्येन पक्षी अन्य पक्षियों की अपेक्षा उत्तम हो. श्येन पक्षियों में भी सबसे तेज चलने वाला श्येन प्रधान हो, क्योंकि वही बिना पहियों वाले रथ द्वारा देवों से सेवित सोमरूप हव्य को मनु प्रजापति के निमित्त स्वर्ग से लाया था. (४)
O deserters! The xen bird is better than other birds. Sheen is also the fastest-moving sheen prince among the birds, because he brought somrup havya, served to the gods by a chariot without wheels, from heaven for the sake of Manu Prajapati. (4)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
भर॒द्यदि॒ विरतो॒ वेवि॑जानः प॒थोरुणा॒ मनो॑जवा असर्जि । तूयं॑ ययौ॒ मधु॑ना सो॒म्येनो॒त श्रवो॑ विविदे श्ये॒नो अत्र॑ ॥ (५)
श्येन पक्षी जब बाधकों को डराता हुआ सोम लाया था, तब विस्तीर्ण मार्ग में वह मन के समान तीव्रगति से उड़ा था. वह श्येन सोमरूप अन्न के साथ शीघ्र उड़ा था, इसलिए उसने इस संसार में प्रसिद्धि पाई थी. (५)
When the lion bird had brought the mon scares the barriers, it was blown up in the wide path at the same speed as the mind. He was quickly blown up with the Sheen Somrup grain, so he had gained fame in this world. (5)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
ऋ॒जी॒पी श्ये॒नो दद॑मानो अं॒शुं प॑रा॒वतः॑ शकु॒नो म॒न्द्रं मद॑म् । सोमं॑ भरद्दादृहा॒णो दे॒वावा॑न्दि॒वो अ॒मुष्मा॒दुत्त॑रादा॒दाय॑ ॥ (६)
सीधा उड़ने वाला श्येन पक्षी दूर यात्रा से सोम लाते समय देवों के साथ हुआ एवं नशा करने वाले प्रसिद्ध सोम को दृढतापूर्वक लाया था. (६)
The straight-flying shyen bird happened to the gods while bringing the mon from a distant journey and had brought the famous som, who was drunk, firmly. (6)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 26
आ॒दाय॑ श्ये॒नो अ॑भर॒त्सोमं॑ स॒हस्रं॑ स॒वाँ अ॒युतं॑ च सा॒कम् । अत्रा॒ पुरं॑धिरजहा॒दरा॑ती॒र्मदे॒ सोम॑स्य मू॒रा अमू॑रः ॥ (७)
श्येन पक्षी हजार एवं अयुत (दस हजार) यज्ञों के साथ सोमरूपी अन्न को लाया था. सोम लाने पर बहुज्ञ एवं प्राज्ञ इंद्र ने सोम के नशे के कारण शत्रुओं का नाश किया. (७)
The Shyen bird had brought somrupi food with thousand and ayut (ten thousand) yagyas. On bringing Soma, the polygynous and knowledgeable Indra destroyed the enemies due to Som's intoxication. (7)