हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.30.15

मंडल 4 → सूक्त 30 → श्लोक 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
उ॒त दा॒सस्य॑ व॒र्चिनः॑ स॒हस्रा॑णि श॒ताव॑धीः । अधि॒ पञ्च॑ प्र॒धीँरि॑व ॥ (१५)
हे इंद्र! जिस प्रकार पहिए के चारों ओर शंकु होते हैं, उसी प्रकार वचि नामक दास के चारों ओर हजार-पांच सौ सेवक थे. तुमने उनका वध किया. (१५)
O Indra! Just as there are cones around the wheel, so there were a thousand or five hundred servants around the dasa named Vachi. You killed them. (15)