ऋग्वेद (मंडल 4)
तं वां॒ रथं॑ व॒यम॒द्या हु॑वेम पृथु॒ज्रय॑मश्विना॒ संग॑तिं॒ गोः । यः सू॒र्यां वह॑ति वन्धुरा॒युर्गिर्वा॑हसं पुरु॒तमं॑ वसू॒युम् ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे शीघ्र चलने वाले एवं गायों से मिलाने वाले रथ को पुकारते हैं. वह रथ सूर्यकन्या को धारण करने वाला, बैठने के निमित्त काष्ठ आसन से युक्त, स्तुतियां प्राप्त करने वाला एवं अधिक संपत्ति युक्त है. (१)
O Ashwinikumaro! We call upon your fast-moving chariot and meeting the cows. The chariot is holding suryakanya, equipped with a wooden seat for sitting, receiving praises and having more wealth. (1)
ऋग्वेद (मंडल 4)
यु॒वं श्रिय॑मश्विना दे॒वता॒ तां दिवो॑ नपाता वनथः॒ शची॑भिः । यु॒वोर्वपु॑र॒भि पृक्षः॑ सचन्ते॒ वह॑न्ति॒ यत्क॑कु॒हासो॒ रथे॑ वाम् ॥ (२)
हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! तुम दोनों देव अपने कमों द्वारा प्रसिद्ध शोभा प्राप्त करते हो. जब महान् अश्च तुम्हें रथ में ढोते हैं, तब सोमरस तुम्हारे शरीर को प्राप्त करता है. (२)
O son of heaven, Ashwinikumaro! Both of you gods receive the famous splendor by your servants. When the great assh carries you in the chariot, the somras receives your body. (2)
ऋग्वेद (मंडल 4)
को वा॑म॒द्या क॑रते रा॒तह॑व्य ऊ॒तये॑ वा सुत॒पेया॑य वा॒र्कैः । ऋ॒तस्य॑ वा व॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॒ नमो॑ येमा॒नो अ॑श्वि॒ना व॑वर्तत् ॥ (३)
आज सोम देने वाला कौन सा यजमान अपनी रक्षा, सोमरसपान अथवा यज्ञ की पूर्ति के लिए स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करता है? हे अश्विनीकुमारो! नमस्कार करने वाला कौन व्यक्ति तुम्हें अपने यज्ञ की ओर खींचता है? (३)
Which host who gives soma today praises him by praises for his protection, the fulfillment of somerasana or yajna? O Ashwinikumaro! Who greets you draws you to his yajna? (3)
ऋग्वेद (मंडल 4)
हि॒र॒ण्यये॑न पुरुभू॒ रथे॑ने॒मं य॒ज्ञं ना॑स॒त्योप॑ यातम् । पिबा॑थ॒ इन्मधु॑नः सो॒म्यस्य॒ दध॑थो॒ रत्नं॑ विध॒ते जना॑य ॥ (४)
हे अनेक रूपधारी अश्चिनीकुमारो! तुम दोनों अपने स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा इस यज्ञ में आओ, मधुर सोमरस पिओ एवं सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन दो. (४)
These are the many forming Aschinikumaro! You both come to this yagna with your golden chariot, drink the sweet somarah and give delightful wealth to the serving host. (4)
ऋग्वेद (मंडल 4)
आ नो॑ यातं दि॒वो अच्छा॑ पृथि॒व्या हि॑र॒ण्यये॑न सु॒वृता॒ रथे॑न । मा वा॑म॒न्ये नि य॑मन्देव॒यन्तः॒ सं यद्द॒दे नाभिः॑ पू॒र्व्या वा॑म् ॥ (५)
तुम दोनों स्वर्णनिर्मित एवं भलीप्रकार घूमने वाले रथ द्वारा स्वर्ग से हमारे पास आते हो. तुम्हारी अभिलाषा करने वाले अन्य यजमान तुम्हें रोक न लें, इसीलिए हमने पहले तुम्हारी स्तुति कर ली है. (५)
You both come to us from heaven by a golden and well-rotating chariot. Let not the other hosts who wish you stop you, that is why we have praised you first. (5)
ऋग्वेद (मंडल 4)
नू नो॑ र॒यिं पु॑रु॒वीरं॑ बृ॒हन्तं॒ दस्रा॒ मिमा॑थामु॒भये॑ष्व॒स्मे । नरो॒ यद्वा॑मश्विना॒ स्तोम॒माव॑न्स॒धस्तु॑तिमाजमी॒ळ्हासो॑ अग्मन् ॥ (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक पुत्र-पौत्रों से युक्त महान् धन शीघ्र दो. पुरुमीढ के ऋत्विजों ने तुम्हारी स्तुति की है और अजमीढ के ऋत्विजं ने उसका साथ दिया है. (६)
O Ashwinikumaro! You must give a great wealth with many sons and grandsons soon. The ritvijs of Purumidh have praised you and the rituals of Ajmidh have supported him. (6)
ऋग्वेद (मंडल 4)
इ॒हेह॒ यद्वां॑ सम॒ना प॑पृ॒क्षे सेयम॒स्मे सु॑म॒तिर्वा॑जरत्ना । उ॒रु॒ष्यतं॑ जरि॒तारं॑ यु॒वं ह॑ श्रि॒तः कामो॑ नासत्या युव॒द्रिक् ॥ (७)
हे समान मन वाले अश्चिनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७)
O ashchinikumaro with the same mind! The praise we send to you, let it bear fruit for us. O ashwinikumaro with beautiful food! You protect the praise-giver. O nastyo! Our desire is dependent on yours. (7)