ऋग्वेद (मंडल 5)
स॒दा॒पृ॒णो य॑ज॒तो वि द्विषो॑ वधीद्बाहुवृ॒क्तः श्रु॑त॒वित्तर्यो॑ वः॒ सचा॑ । उ॒भा स वरा॒ प्रत्ये॑ति॒ भाति॑ च॒ यदीं॑ ग॒णं भज॑ते सुप्र॒याव॑भिः ॥ (१२)
सदापृण, यजत, वाहुवृक्त, श्रुतवित एवं तर्य नामक ऋषि तुम्हारे हितैषी बनकर तुम्हारे शत्रुओं का नाश करें. ये ऋषि दोनों लोकों की कामनाओं को प्राप्त करके दीप्तिसंपन्न बनते हैं. ये विविध स्तोत्रों द्वारा विश्वदेवों की उपासना करते हैं. (१२)
May the sages named Sadaprina, Yajat, Vahuvrita, Shrutvita and Taraya be your benefactors and destroy your enemies. These sages become bright by attaining the wishes of both the people. They worship the Vishwadevas through various hymns. (12)