ऋग्वेद (मंडल 5)
तद्वो॑ यामि॒ द्रवि॑णं सद्यऊतयो॒ येना॒ स्व१॒॑र्ण त॒तना॑म॒ नॄँर॒भि । इ॒दं सु मे॑ मरुतो हर्यता॒ वचो॒ यस्य॒ तरे॑म॒ तर॑सा श॒तं हिमाः॑ ॥ (१५)
हे शीघ्र रक्षा करने वाले मरुतो! हम तुमसे धन की याचना करते हैं. उसके द्वारा हम सूर्यकिरणों के समान अपने परिवार का विस्तार कर सकें. हे मरुतो! तुम इस स्तुति को पसंद करो, जिससे हम सौ हेमंतों को पार कर सकें. (१५)
O you who protect you soon, Maruto! We ask you for money. Through him we can expand our family like the sunkirans. O Maruto! You like this praise, so that we may cross a hundred hemants. (15)