ऋग्वेद (मंडल 5)
न स जी॑यते मरुतो॒ न ह॑न्यते॒ न स्रे॑धति॒ न व्य॑थते॒ न रि॑ष्यति । नास्य॒ राय॒ उप॑ दस्यन्ति॒ नोतय॒ ऋषिं॑ वा॒ यं राजा॑नं वा॒ सुषू॑दथ ॥ (७)
हे मरुतो! तुम जिस ऋषि या राजा को यज्ञकर्म में लगाते हो, वह दूसरों द्वारा न हारता है और न मारा जाता है. वह न क्षीण होता है, न कष्ट पाता है और न उसे कोई बाधा पहुंचा सकता है. उसका धन एवं रक्षा साधन भी कभी समाप्त नहीं होते. (७)
O Maruto! The sage or king you employ in the yagnakarma is not defeated or killed by others. He does not fade, he does not suffer, nor can he be hindered. His money and defense are also never exhausted. (7)